Sunday, 23 June 2019

sukh kya hai?


सुख क्या है ?




आज हमारा दृढ़ विश्वास है कि इन्द्रियों से जो सुख प्राप्त होता है वह संसार की वस्तुओं  में विद्यमान है।  इसी विश्वास में रहकर हम अधिकाधिक धन कमाने,  इकठ्ठा करने और बांधकर रखने का प्रयास करते रहते है।  किन्तु थोडासा विचार करते  ही स्पष्ट हो जायेगा की धन का अर्जन और संग्रह किसी व्यक्ति के सुख का मापदंड नहीं हो सकता।

 फिर यदि विषय वस्तुओं में सुख विद्यमान होता तो जो भी व्यक्ति उसके संपर्क में आता उसे सामान रूप से उतना ही सुख सदा मिलता रहता, किन्तु स्पष्ट रूप से हम देखते है की यह सत्य नही है. उदाहरण स्वरुप सिगरेट से एक व्यक्ति को संतोष मिलता है किन्तु दुसरे  को उससे घृणा होती है| एक व्यक्ति को संतोष और दूसरे व्यक्ति को घृणा क्यों होती है? इस प्रकार विकार करते  हुए हम इस मूल प्रश्न पर पहुंचते है की सुख क्या है?

सावधानीपूर्वक विश्नेशन करने से ज्ञात होता है की मनुष्य का सुख उसकी वैयक्तिक अनुभूति है, क्योकि मानसिक  स्थिति  से दुःख सुख का सम्बन्ध हमे अपने अनुभव्  में स्पष्ट दिखाई देता है. मन विक्षिप्त होने पर हम दुःख का अनुभव करते है और जब मन शांत होता है, हमे सुख लगता है. अतः ऐसे ही मन की शांति से ही सुख की मात्रा नापी जाती है. 

मनुष्य  सृष्टि की सर्वोत्कृष्ट रचना होने के कारन अपने आस पास की वस्तुओ पर आश्रित हुए बिना अपने मन को शांत रखने की क्षमता रखता है. वह अपनी इस क्षमता से अनभिज्ञ  है क्योकि उसकी शक्ति सुप्तावस्था में पड़ी है और वह मूढ़ता वश संसार की वस्तुओ से आकृष्ट होकर उन्ही में शिख खोज रहा है.विषयो में सुख की झूठी ललक दिखाई देती है. इसलिए उनसे जो सुख मिलता है वह भी स्थायी नहीं है, क्षण में नष्ट  हो जाता है. 

इस प्रकार जो समज़दार व्यक्ति इन्द्रिय कामना का कारन और उसकी यांत्रिकता को समज़ता है उसके लिए ब्रह्मचर्य का अनुशासन कठिन बही दिखलाई देता. ब्रह्मचर्य ही सब कुछ है और वह केवल  इस बात पर बल देता है की किसी  भी  बात में अति न  करो.